<?xml version="1.0" encoding="utf-8" ?>
<rss version="2.0" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" >
<channel>
<title>قرآن کریم</title>
<link>http://114nor.blogfa.com/</link>
<description>پروردگارا تو آن بخشنده و کریمی هستی که بخشش را دوست داری پس ما را ببخش و بیامرز</description>
<language>fa</language>
<generator>blogfa.com</generator>
<lastBuildDate>Tue, 25 Jul 2006 11:16:18 GMT</lastBuildDate>
<item>
<title>اخبار امروز</title>
<link>http://114nor.blogfa.com/post-30.aspx</link>
<description>&lt;SCRIPT language=javascript 
src=&quot;http://reader.webgozar.com/feedreader/reader.aspx?Feed=http://www.irna.ir/index2.php?option=com_news%26task=rss%26Itemid=783%26occasionid=78%26lang=fa&amp;amp;maxFeed=10&quot;&gt;&lt;/SCRIPT&gt;
&lt;!-- End WebGozar.com Rss Reader code --&gt;&lt;!-- Start WebGozar.com Rss Reader code  --&gt;
&lt;STYLE&gt;
.WFeedTitle{font-family:tahoma;font-size:8pt;color:#003399;text-decoration:none;font-weight:600}.WFeedTitle:hover{color:#ff4400;}
.WFeed{font-family:tahoma;font-size:9pt;color:#003399;text-decoration:none;}.WFeed:hover{color:#ff4400;}
&lt;/STYLE&gt;

&lt;SCRIPT language=javascript 
src=&quot;http://reader.webgozar.com/feedreader/reader.aspx?Feed=http://www.irna.ir/index2.php?option=com_news%26task=rss%26Itemid=273%26lineid=%26keyid=0%26catid=0%26lang=fa&amp;amp;maxFeed=10&quot;&gt;&lt;/SCRIPT&gt;</description>
<pubDate>Tue, 25 Jul 2006 11:16:18 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=114nor&amp;postid=30</comments>
<dc:creator>114nor</dc:creator>
<guid>http://114nor.blogfa.com/post-30.aspx</guid>
</item>
<item>
<title>حجاب از دیدگاه قرآن</title>
<link>http://114nor.blogfa.com/post-29.aspx</link>
<description>&lt;FONT color=#a00000&gt;قرآن &amp;nbsp;- &amp;nbsp;سوره:&amp;nbsp;النساء&amp;nbsp;-&amp;nbsp;آيه:&amp;nbsp;155&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#a00000&gt;&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT size=3&gt;فَبِمَا نَقْضِهِم مِّيثَاقَهُمْ وَكُفْرِهِم بَآيَاتِ اللّهِ وَقَتْلِهِمُ الأَنْبِيَاء بِغَيْرِ حَقًّ وَقَوْلِهِمْ قُلُوبُنَا غُلْفٌ &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=3&gt;بَلْ طَبَعَ اللّهُ عَلَيْهَا بِكُفْرِهِمْ فَلاَ يُؤْمِنُونَ إِلاَّ قَلِيلاً&lt;/FONT&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT face=Tahoma color=green size=2&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT face=Tahoma color=green size=2&gt;پ&lt;/FONT&gt;&lt;FONT face=Tahoma color=green size=2&gt;س به كيفر پيمان&amp;nbsp;شكنى آنان و&amp;nbsp;كفرشان به آيات خدا&amp;nbsp;، و&amp;nbsp;به ناحق كشتن پيامبران&amp;nbsp;، و&amp;nbsp;گفتار [&amp;nbsp;بى&amp;nbsp;پايه و&amp;nbsp;باطل&amp;nbsp;]شان كه دل&amp;nbsp;هاى ما در پوشش و&amp;nbsp;&lt;FONT color=red&gt;حجاب&lt;/FONT&gt; است [&amp;nbsp;از اين رو سخن حق را درك نمي &amp;nbsp;كنيم&amp;nbsp;، لعنتشان كرديم&amp;nbsp;;&amp;nbsp;] بلكه به سبب كفرشان بر دل&amp;nbsp;هايشان مُهرِ [محروميت از فهم معارف] زديم&amp;nbsp;; به همين سبب جز&amp;nbsp;اندكى&amp;nbsp;ايمان نمي &amp;nbsp;آورند&amp;nbsp;.&lt;/FONT&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT face=Tahoma color=#a00000 size=2&gt;قرآن &amp;nbsp;- &amp;nbsp;سوره:&amp;nbsp;الاعراف&amp;nbsp;-&amp;nbsp;آيه:&amp;nbsp;46&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;&lt;FONT color=#a00000&gt;&lt;/FONT&gt;
&lt;P&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT size=3&gt;وَبَيْنَهُمَا &lt;FONT color=red&gt;حِجَابٌ&lt;/FONT&gt; وَعَلَى الأَعْرَافِ رِجَالٌ يَعْرِفُونَ كُلاًّ بِسِيمَاهُمْ وَنَادَوْاْ أَصْحَابَ الْجَنَّةِ أَن &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=3&gt;سَلاَمٌ عَلَيْكُمْ لَمْ يَدْخُلُوهَا وَهُمْ يَطْمَعُونَ&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT face=Tahoma color=green size=2&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT face=Tahoma color=green size=2&gt;و&lt;/FONT&gt;&lt;FONT face=Tahoma color=green size=2&gt;&amp;nbsp;ميان آن دو [&amp;nbsp;گروه بهشتيان و&amp;nbsp;دوزخيان&amp;nbsp;] حائلى است&amp;nbsp;، و&amp;nbsp;بر اعراف&amp;nbsp;، مردانى [&amp;nbsp;با مقام و&amp;nbsp;منزلت&amp;nbsp;اند&amp;nbsp;] كه هر كدام از دو گروه را به نشانه&amp;nbsp;هايشان مي &amp;nbsp;شناسند&amp;nbsp;، و&amp;nbsp;بهشتيان را كه وارد بهشت نشده&amp;nbsp;اند&amp;nbsp;، ولى ورود به آن را اميد دارند&amp;nbsp;، آواز مي &amp;nbsp;دهند كه درود بر شما&amp;nbsp;.&lt;/FONT&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT face=Tahoma color=#a00000 size=2&gt;قرآن &amp;nbsp;- &amp;nbsp;سوره:&amp;nbsp;الاسراء&amp;nbsp;-&amp;nbsp;آيه:&amp;nbsp;45&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;&lt;FONT color=#a00000&gt;&lt;/FONT&gt;
&lt;P&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT size=3&gt;وَإِذَا قَرَأْتَ الْقُرآنَ جَعَلْنَا بَيْنَكَ وَبَيْنَ الَّذِينَ لاَ يُؤْمِنُونَ بِالآخِرَةِ &lt;FONT color=red&gt;حِجَابً&lt;/FONT&gt;ا مَّسْتُورًا&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT face=Tahoma color=green size=2&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT face=Tahoma color=green size=2&gt;و&amp;nbsp;هنگامي كه قرآن بخوانى&amp;nbsp;، ميان تو و&amp;nbsp;آنان كه به آخرت ايمان ندارند&amp;nbsp;، پرده&amp;nbsp;اى نامريى قرار مي &amp;nbsp;دهيم [&amp;nbsp;كه به سزاى لجاجت و&amp;nbsp;كفرشان از فهم آن محروم شوند&amp;nbsp;.&amp;nbsp;]&lt;/FONT&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT face=Tahoma color=#a00000 size=2&gt;قرآن &amp;nbsp;- &amp;nbsp;سوره:&amp;nbsp;مريم&amp;nbsp;-&amp;nbsp;آيه:&amp;nbsp;17&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;&lt;FONT color=#a00000&gt;&lt;/FONT&gt;
&lt;P&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT size=3&gt;فَاتَّخَذَتْ مِن دُونِهِمْ &lt;FONT color=red&gt;حِجَابً&lt;/FONT&gt;ا فَأَرْسَلْنَا إِلَيْهَا رُوحَنَا فَتَمَثَّلَ لَهَا بَشَرًا سَوِيًّا&lt;/FONT&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT face=Tahoma color=green size=2&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT face=Tahoma color=green size=2&gt;و&amp;nbsp;جدا از آنان پوشش و&amp;nbsp;پرده&amp;nbsp;اى براى خود قرار داد&amp;nbsp;. و&amp;nbsp;ما روح خود را به سوى او فرستاديم&amp;nbsp;، پس براى او [&amp;nbsp;به صورت&amp;nbsp;] بشرى خوش اندام و&amp;nbsp;معتدل نمودار شد&amp;nbsp;.&lt;/FONT&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT face=Tahoma color=#a00000 size=2&gt;قرآن &amp;nbsp;- &amp;nbsp;سوره:&amp;nbsp;النور&amp;nbsp;-&amp;nbsp;آيه:&amp;nbsp;60&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;&lt;FONT color=#a00000&gt;&lt;/FONT&gt;
&lt;P&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT size=3&gt;وَالْقَوَاعِدُ مِنَ النِّسَاء اللَّاتِي لَا يَرْجُونَ نِكَاحًا فَلَيْسَ عَلَيْهِنَّ جُنَاحٌ أَن يَضَعْنَ ثِيَابَهُنَّ غَيْرَ &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=3&gt;مُتَبَرِّجَاتٍ بِزِينَةٍ وَأَن يَسْتَعْفِفْنَ خَيْرٌ لَّهُنَّ وَاللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ&lt;/FONT&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT face=Tahoma color=green size=2&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT face=Tahoma color=green size=2&gt;و&amp;nbsp;بر زنان از كار افتاده&amp;nbsp;اى كه اميد ازدواجى ندارند&amp;nbsp;، گناهى نيست كه &lt;FONT color=red&gt;حجاب&lt;/FONT&gt; و&amp;nbsp;روپوش خود را كنار بگذارند&amp;nbsp;، در صورتى كه با زيور و&amp;nbsp;آرايش خويش قصد خودآرايى نداشته باشند&amp;nbsp;. و&amp;nbsp;پاكدامنى براى آنان بهتر است&amp;nbsp;; و&amp;nbsp;خدا شنوا و&amp;nbsp;داناست&amp;nbsp;.&lt;/FONT&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT face=Tahoma color=#a00000 size=2&gt;قرآن &amp;nbsp;- &amp;nbsp;سوره:&amp;nbsp;الاحزاب&amp;nbsp;-&amp;nbsp;آيه:&amp;nbsp;53&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;&lt;FONT color=#a00000&gt;&lt;/FONT&gt;
&lt;P&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT size=3&gt;يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَدْخُلُوا بُيُوتَ النَّبِيِّ إِلَّا أَن يُؤْذَنَ لَكُمْ إِلَى طَعَامٍ غَيْرَ نَاظِرِينَ إِنَاهُ &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=3&gt;وَلَكِنْ إِذَا دُعِيتُمْ فَادْخُلُوا فَإِذَا طَعِمْتُمْ فَانتَشِرُوا وَلَا مُسْتَأْنِسِينَ لِحَدِيثٍ إِنَّ ذَلِكُمْ كَانَ&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=3&gt;&amp;nbsp;ي&lt;/FONT&gt;&lt;FONT size=3&gt;ُؤْذِي النَّبِيَّ فَيَسْتَحْيِي مِنكُمْ وَاللَّهُ لَا يَسْتَحْيِي مِنَ الْحَقِّ وَإِذَا سَأَلْتُمُوهُنَّ مَتَاعًا &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=3&gt;فَاسْأَلُوهُنَّ مِن وَرَاء &lt;FONT color=red&gt;حِجَابٍ&lt;/FONT&gt; ذَلِكُمْ أَطْهَرُ لِقُلُوبِكُمْ وَقُلُوبِهِنَّ وَمَا كَانَ لَكُمْ أَن تُؤْذُوا رَسُولَ &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=3&gt;اللَّهِ وَلَا أَن تَنكِحُوا أَزْوَاجَهُ مِن بَعْدِهِ أَبَدًا إِنَّ ذَلِكُمْ كَانَ عِندَ اللَّهِ عَظِيمًا&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT face=Tahoma color=green size=2&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT face=Tahoma color=green size=2&gt;اى مؤمنان&amp;nbsp;! به خانه&amp;nbsp;هاى پيامبر جز آنكه براى خوردن غذايى به شما اجازه دهند وارد نشويد&amp;nbsp;، چشم انتظار فرا رسيدن وقت خوردن آن هم نباشيد [&amp;nbsp;كه پى در پى آوردنش را بخواهيد و&amp;nbsp;از اين جهت اسائه ادب كنيد&amp;nbsp;]&amp;nbsp;; ولى هنگامي كه دعوت شديد وارد شويد&amp;nbsp;، و&amp;nbsp;چون غذا خورديد و&amp;nbsp;بى&amp;nbsp;آنكه [&amp;nbsp;پس از صرف غذا&amp;nbsp;] سرگرم سخن گرديد&amp;nbsp;، پراكنده شويد&amp;nbsp;، اين [&amp;nbsp;كار كه بنشينيد و&amp;nbsp;سرگرم سخن گرديد&amp;nbsp;] پيامبر را آزار مي &amp;nbsp;دهد و&amp;nbsp;از شما حيا مي &amp;nbsp;كند [&amp;nbsp;كه بيرونتان كند&amp;nbsp;] ولى خدا از حق حيا نمي &amp;nbsp;كند&amp;nbsp;. و&amp;nbsp;زمانى كه از همسرانش متاعى خواستيد از پشت پرده و&amp;nbsp;&lt;FONT color=red&gt;حجاب&lt;/FONT&gt;ى از آنان بخواهيد&amp;nbsp;، كه اين براى قلب شما و&amp;nbsp;قلب&amp;nbsp;هاى آنان پاكيزه&amp;nbsp;تر است&amp;nbsp;. و&amp;nbsp;شما را نسزد [&amp;nbsp;و&amp;nbsp;جايز نباشد&amp;nbsp;] كه پيامبر خدا را آزار دهيد&amp;nbsp;. و&amp;nbsp;بر شما هرگز جايز نيست كه پس از او با همسرانش ازدواج كنيد&amp;nbsp;; كه اين [&amp;nbsp;كار&amp;nbsp;] نزد خدا بزرگ است&amp;nbsp;.&lt;/FONT&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT face=Tahoma color=#a00000 size=2&gt;قرآن &amp;nbsp;- &amp;nbsp;سوره:&amp;nbsp;الاحزاب&amp;nbsp;-&amp;nbsp;آيه:&amp;nbsp;55&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;&lt;FONT color=#a00000&gt;&lt;/FONT&gt;
&lt;P&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT size=3&gt;لّ&lt;/FONT&gt;&lt;FONT size=3&gt;َا جُنَاحَ عَلَيْهِنَّ فِي آبَائِهِنَّ وَلَا أَبْنَائِهِنَّ وَلَا إِخْوَانِهِنَّ وَلَا أَبْنَاء إِخْوَانِهِنَّ وَلَا أَبْنَاء أَخَوَاتِهِنَّ وَلَا &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=3&gt;ن&lt;/FONT&gt;&lt;FONT size=3&gt;ِسَائِهِنَّ وَلَا مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُهُنَّ وَاتَّقِينَ اللَّهَ إِنَّ اللَّهَ كَانَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ شَهِيدًا&lt;/FONT&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT face=Tahoma color=green size=2&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT face=Tahoma color=green size=2&gt;همسران پيامبر را نزد پدرانشان و&amp;nbsp;پسرانشان و&amp;nbsp;برادرانشان و&amp;nbsp;پسران برادرانشان و&amp;nbsp;پسران خواهرانشان و&amp;nbsp;زنان هم كيششان و&amp;nbsp;بردگانشان [&amp;nbsp;در ترك پوشش و&amp;nbsp;&lt;FONT color=red&gt;حجاب&lt;/FONT&gt;&amp;nbsp;] گناهى نيست&amp;nbsp;; و&amp;nbsp;از خدا پروا كنيد كه خدا به هر چيزى گواه است&amp;nbsp;.&lt;/FONT&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT face=Tahoma color=#a00000 size=2&gt;قرآن &amp;nbsp;- &amp;nbsp;سوره:&amp;nbsp;ص&amp;nbsp;-&amp;nbsp;آيه:&amp;nbsp;32&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;&lt;FONT color=#a00000&gt;&lt;/FONT&gt;
&lt;P&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT size=3&gt;فَقَالَ إِنِّي أَحْبَبْتُ حُبَّ الْخَيْرِ عَن ذِكْرِ رَبِّي حَتَّى تَوَارَتْ بِالْ&lt;FONT color=red&gt;حِجَابِ&lt;/FONT&gt;&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT face=Tahoma color=green size=2&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT face=Tahoma color=green size=2&gt;پس گفت&amp;nbsp;: من دوستى اسبان را بر ياد پروردگارم [&amp;nbsp;كه نماز مستحب پايان روز است&amp;nbsp;] اختيار كردم [&amp;nbsp;زيرا مي &amp;nbsp;خواهم از آنان در جهاد با دشمن استفاده كنم و&amp;nbsp;همواره به آنها نظر مي &amp;nbsp;كرد&amp;nbsp;] تا [&amp;nbsp;خورشيد&amp;nbsp;] پشت پرده افق پنهان شد&amp;nbsp;.&lt;/FONT&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT face=Tahoma color=#a00000 size=2&gt;قرآن &amp;nbsp;- &amp;nbsp;سوره:&amp;nbsp;فصلت&amp;nbsp;-&amp;nbsp;آيه:&amp;nbsp;5&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;&lt;FONT color=#a00000&gt;&lt;/FONT&gt;
&lt;P&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT size=3&gt;وَقَالُوا قُلُوبُنَا فِي أَكِنَّةٍ مِّمَّا تَدْعُونَا إِلَيْهِ وَفِي آذَانِنَا وَقْرٌ وَمِن بَيْنِنَا وَبَيْنِكَ &lt;FONT color=red&gt;حِجَابٌ&lt;/FONT&gt; فَاعْمَلْ إِنَّنَا عَامِلُونَ&lt;/FONT&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT face=Tahoma color=green size=2&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT face=Tahoma color=green size=2&gt;و&amp;nbsp;گفتند&amp;nbsp;: دل&amp;nbsp;هاى ما از [&amp;nbsp;درك&amp;nbsp;] حقايقى كه ما را به آن مي &amp;nbsp;خوانى در پوشش&amp;nbsp;هاى سختى است&amp;nbsp;، و&amp;nbsp;در گوش&amp;nbsp;هاى ما سنگينى است&amp;nbsp;، و&amp;nbsp;ميان ما و&amp;nbsp;تو پرده&amp;nbsp;اى وجود دارد&amp;nbsp;، بنابراين تو كار خود را انجام بده و&amp;nbsp;ما هم كار خود را انجام مي &amp;nbsp;دهيم&amp;nbsp;.&lt;/FONT&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT face=Tahoma color=#a00000 size=2&gt;قرآن &amp;nbsp;- &amp;nbsp;سوره:&amp;nbsp;الشورى&amp;nbsp;-&amp;nbsp;آيه:&amp;nbsp;51&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;&lt;FONT color=#a00000&gt;&lt;/FONT&gt;
&lt;P&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT size=3&gt;وَمَا كَانَ لِبَشَرٍ أَن يُكَلِّمَهُ اللَّهُ إِلَّا وَحْيًا أَوْ مِن وَرَاء &lt;FONT color=red&gt;حِجَابٍ&lt;/FONT&gt; أَوْ يُرْسِلَ رَسُولًا فَيُوحِيَ بِإِذْنِهِ مَا &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=3&gt;يَشَاء إِنَّهُ عَلِيٌّ حَكِيمٌ&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT face=Tahoma color=green size=2&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT face=Tahoma color=green size=2&gt;هيچ بشرى را نسزد كه خدا با او سخن گويد&amp;nbsp;، مگر از راه وحى يا از پشت &lt;FONT color=red&gt;حجاب&lt;/FONT&gt; غيب يا رسولى [&amp;nbsp;چون فرشته&amp;nbsp;]مي &amp;nbsp;فرستد&amp;nbsp;; پس فرشته به اذن او آنچه را بخواهد وحى مي &amp;nbsp;كند&amp;nbsp;; يقيناً او بلند مرتبه و&amp;nbsp;حكيم است&amp;nbsp;.&lt;/FONT&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT face=Tahoma color=#a00000 size=2&gt;قرآن &amp;nbsp;- &amp;nbsp;سوره:&amp;nbsp;الزخرف&amp;nbsp;-&amp;nbsp;آيه:&amp;nbsp;36&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;&lt;FONT color=#a00000&gt;&lt;/FONT&gt;
&lt;P&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT size=3&gt;وَمَن يَعْشُ عَن ذِكْرِ الرَّحْمَنِ نُقَيِّضْ لَهُ شَيْطَانًا فَهُوَ لَهُ قَرِينٌ&lt;/FONT&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT face=Tahoma color=green size=2&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT face=Tahoma color=green size=2&gt;و&amp;nbsp;هر كس خود را از ياد [&amp;nbsp;خداى&amp;nbsp;] رحمان به كوردلى و&amp;nbsp;&lt;FONT color=red&gt;حجاب&lt;/FONT&gt; باطن بزند&amp;nbsp;، شيطانى بر او مي &amp;nbsp;گماريم كه آن شيطان ملازم و&amp;nbsp;دمسازش باشد&amp;nbsp;.&lt;/FONT&gt;&lt;BR&gt;&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Fri, 21 Jul 2006 09:02:18 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=114nor&amp;postid=29</comments>
<dc:creator>114nor</dc:creator>
<guid>http://114nor.blogfa.com/post-29.aspx</guid>
</item>
<item>
<title>فاطمه (ص)</title>
<link>http://114nor.blogfa.com/post-28.aspx</link>
<description>&lt;H1&gt;&lt;FONT size=3&gt;ولادت&lt;/FONT&gt;&amp;nbsp;&lt;/H1&gt;سال چهارم &lt;A class=notexistdaneshnamehlink title=&quot;صفحه درخواستی هنوز تهیه نشده است. برای ویرایش آن باید قبلا وارد شده باشید&quot; onclick=alert(this.title);&gt;&lt;U&gt;بعثت&lt;/U&gt;&lt;/A&gt; بود که خداوند اراده فرمود به پیامبر گرامی‏اش هدیه‏ای بهشتی و تحفه‏ای گرانبها عطا فرماید؛ دختری که نسل پاک رسول خدا از طریق او تکثیر گردد. برای دریافت این هدیه الهی، مقدماتی لازم بود. لذا از جانب حضرت حق دستورات لازم برای آمادگی رسول خدا و خدیجه داده شد و سپس فاطمه علیهاسلام در بیستم جمادی الثانی سال پنجم بعثت، در سرزمین توحید، مکه معظمه ، متولد شد و دنیا را به نور وجود خود منوّر ساخت. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;او دختری بود به سیمای خاکیان، ولی برتر از ملائک، چرا که خلقتش از نور بود و بویش بوی بهشت. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;فاطمه علیهاسلام نام‌های بسیاری دارد که هر کدام دارای معانی و مفاهیم بلند و ملکوتی است. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;A id=فضایل&gt;
&lt;H1&gt;&lt;FONT size=3&gt;فضایل&lt;/FONT&gt; &lt;/H1&gt;&lt;/A&gt;فاطمه علیهاسلام در خانه رسول خدا بزرگ شد و با مجاهدات و تلاش پیگیرش، تحت تربیت رسول مکرم، به مقامات بلند معنوی دست یافت؛ به‌طوری که در ستایش او چندین آیه قرآنی نازل شد. رسول خدا به تربیت دختر عزیزش توجه خاصی داشت، در فرصت‌های مناسب او را به بی‌اعتنایی به دنیا و ادب و ایثار و حفظ حجاب و. . . ترغیب می‏فرمود و با نصایح گوناگون و امید بخشیدن به فضل پروردگارو توجه به ذکر و تسبیح الهی به تربیت وی همت می‏گماشت. پیامبر اکرم بارها در سخنانش مقام و موقعیت والای فاطمه را برای مسلمان‏ها بیان می‏کرد و می‏فرمود: « فاطمه سبب خلقت افلاک است و ملائکه الهی در خدمت او هستند. او را اذیت نکنید که اذیت او اذیت من است . فاطمه‌ی من، اهل بهشت است و در قیامت با از شیعیانش شفاعت می کند. » &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;فضایل و مناقب فاطمه علیهاسلام بیرون از حد شمارش است. او در هر زمینه از امور زندگی بر تمام زنان عالم پیش‏قدم بود و گوی سبقت را درایمان و عبادت و زهد و حجاب و. . . ،از همگان ربود و در شوهرداری و ایثار و انفاق و مروت و عدالت و. . . سر آمد همه گشت تا در ردیف کامل ترین زنان عالم جای گرفت و به « سیده النساء » ملقب گردید و از دست مبارکش معجزات زیادی جاری و از سرچشمه علم اولین و آخرین سیراب گشت. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;A id=&quot;علاقه پیامبر نسبت به حضرت فاطمه&quot;&gt;
&lt;H1&gt;&lt;FONT size=3&gt;علاقه پیامبر نسبت به حضرت فاطمه&lt;/FONT&gt; &lt;/H1&gt;&lt;/A&gt;فاطمه علیهاسلام چنان جایگاه بلندی در قلب پیامبر اکرم پیدا کرد که محبت و شیفتگی رسول خدا نسبت به او زبانزد خاص و عام شد و تعبیرات بسیار بلند و لطیفی از زبان رسول خدا نسبت به آن گوهر تابناک تراوش نمود. &lt;BR&gt;او با سختی‌ها و مشکلات فراوان بزرگ شد و هنوز یکی دو سال بیشتر از عمر شریفش نگذشته بود که با پدر بزرگوارش در شعب ابوطالب گرفتار تحریم اجتماعی بت‏پرستان شد و در حدود پنج سالگی که از آن محاصره نجات یافت، مادر مهربانش را از دست داد. در هشت سالگی مجبور به هجرت به مدینه شد ولی علی‌رغم همه آن نابسامانی‏ها، وقتی به سن بلوغ رسید به‏قدری در کسب معارف الهی پیش رفته بود که چشم بزرگان عرب به او دوخته شده بود و خواستگاران فراوانی داشت که با پیشنهاد مهریه‌های سنگین ،افتخار همسری با او را خواستار بودند. اما رسول خدا در جواب آنها می‏فرمود :« ازدواج دخترم فاطمه به امر خدا است.» &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;A id=ازدواج&gt;
&lt;H1&gt;&lt;FONT size=3&gt;ازدواج&lt;/FONT&gt; &lt;/H1&gt;&lt;/A&gt;سرانجام حضرت امیرالمؤمنین علی بن ابیطالب علیه‌السلام، یگانه شخصیتی که صلاحیت همسری و هم‌شانی با فاطمه علیهاسلام را داشت، به خواستگاری او آمد. رسول خدا هم به اذن خداوند، و رضایت فاطمه با ازدواج آنها موافقت فرمود. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;مهریه فاطمه تعیین شد و پس از عقد آسمانی و شادباشی بهشتی، آن وصلت فرخنده به اطلاع عموم مسلمانان مدینه رسید و رسول خدا صیغه عقد را جاری فرمود. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;
&lt;H1&gt;&lt;FONT size=3&gt;توصیه‌های پیامبر پس از ازدواج فاطمه&lt;/FONT&gt; &lt;/H1&gt;از این قضیه حدود یک ماه گذشت تا مقدمات عروسی فراهم شد و پس از ولیمه عروسی ، فاطمه با مهریه‏ای به ظاهر کم‌ارزش وجهیزیه‌ای ساده به خانه بخت رفت. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;رسول خدا هم آداب خاصی را در شب زفاف برای آنها اجرا کرد وسفارش‌های لازم را به عمل آورد و از خانه‌ی آنها خارج شد. &lt;BR&gt;فردا صبح به خانه آنها تشریف‏فرما شد و از آنان احوالپرسی کرد و برایشان دعا فرمود. &lt;BR&gt;روز چهارم هم برنامه‌ی ویژه‏ای برای آنها ترتیب داد و کارها را تقسیم فرمود . و به این ترتیب ازدواج شیرین شاد آنها با &lt;U&gt;همکاری &lt;/U&gt;و تفاهم شروع شد. رسول خدا نیز همواره آنها را زیر نظر داشت و هر دو را به رعایت یکدیگر سفارش می‌فرمود. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;A id=فرزندان&gt;
&lt;H1&gt;&lt;FONT size=3&gt;فرزندان&lt;/FONT&gt; &lt;/H1&gt;&lt;/A&gt;فاطمه زهرا و امیرالمؤمنین دو همسری بودند که هیچگاه در زندگی خود به تجمل و دنیاپرستی نیندیشیدند و با کمال صفا یکدیگر را در پیمودن راه خدا کمک کردند و کوچکترین اختلافی بین آنها صورت نگرفت. خداوند به آنها دو پسر به نام حسن و حسین و دو دختر به نام &lt;U&gt;زینب&lt;/U&gt; و ام کلثوم عنایت فرمود. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;A id=&quot;علاقه پیامبر به فرزندان فاطمه&quot;&gt;
&lt;H1&gt;&lt;FONT size=3&gt;علاقه پیامبر به فرزندان فاطمه&lt;/FONT&gt; &lt;/H1&gt;&lt;/A&gt;رسول اکرم فرزندان فاطمه علیهالسلام را بسیار دوست می‏داشت و آنها را فرزندان خود می‌دانست و می‏فرمود: « آتش جهنم بر فرزندان فاطمه حرام است.» و در فرصت‏های مناسب مسلمین را به رعایت احترام و خدمت سفارش میکرد و لذا فاطمه اطهر و فرزندانش در زمان حیات رسول خدا بسیار محترم و عزیز بودند ولی آن حضرت مکرراً از ظلم‏هایی که پس از او بر آنان روا داشته می‏شود، خبر می‏داد واظهار ناراحتی می‏نمود و امیرالمؤمنین و فاطمه زهرا علیهاسلام را دلداری می‏داد و افسوس و صد افسوس که این دوران، بسیار کوتاه بود و بیش از 9 سال طول نکشید که دست پر مهر رسول خدا از سر آنها برداشته شد و سایه پربرکتش از این جهان رخت بر بست. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;A id=&quot;در سوگ پدر&quot;&gt;
&lt;H1&gt;&lt;FONT size=3&gt;در سوگ پدر&lt;/FONT&gt; &lt;/H1&gt;&lt;/A&gt;فاطمه زهرا علیهاسلام در سوگ پدر بزرگوارش بسیار اندوهگین بود و شب و روز به یاد پدر می‏گریست ، اما در این هنگامه، مسأله غصب خلافت توسط گروهی پیش آمد،که برای تثبیت خلافت خویش، علی‌رغم سفارشات اکید رسول خدا در مورد دخترش، به خانه‌ی فاطمه هجوم آوردند و با تازیانه دست مبارکش را آزردند و پهلوی او را که برای دفاع از حریم ولایت به‌پا خواسته بود، شکستند، بر گردن شیر خدا ریسمان بستند و او را به مسجد کشاندند. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;A id=&quot;مظلومیت فاطمه پس از وفات پیامبر&quot;&gt;
&lt;H1&gt;&lt;FONT size=3&gt;مظلومیت فاطمه پس از وفات پیامبر&lt;/FONT&gt; &lt;/H1&gt;&lt;/A&gt;اما فاطمه پس از این جنایات هولناک که باعث سقط جنین او شد، باز دست از فداکاری و حمایت خود بر نداشت و با همان حال به دنبال امیرالمؤمنین به مسجد رفت و با استفاده از مقام و شخصیت خود، علی علیه السلام را از دست غاصبین نجات داد و سپس به خانه آمد و در بستر بیماری افتاد. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;غاصبین حق امیرالمومنین و زهرا به این هم بسنده نکردند و فدک را که حق مسلم حضرت زهرا بود،غصب کردند تا دست آنها را از مال دنیا هم کوتاه کرده باشند. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;
&lt;H1&gt;&lt;FONT size=3&gt;خطبه فدک &lt;/FONT&gt;&lt;/H1&gt;در این جریان، فاطمه علیهاسلام بارها با ابوبکر و عمر و احتجاجاتی داشت و امیرالمؤمنین نامه تندی به ابوبکر نوشت و حق مسلم فاطمه را اثبات کرد. فاطمه علیهاسلام هم خطبه‌ی تاریخی فدک در حضور جمع بسیاری از مسلمین ایراد فرمود و مدعیان دروغین خلافت و غاصبین فدک را رسوا نمود،اما اّنان بر اجرای مقاصد خویش همچنان پافشاری وبه دادخواهی آن مظلومان تاریخ ،پاسخ صحیح نگفتند بلکه افکار عمومی را علیه آنان شوراندند و با نسبت‌های ناروا و زشت به ساحت قدس امیرالمؤمنین و فاطمه زهرا، مقصود و منظورخودرا بر ملا ساختند. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;اما امیرالمؤمنین و فاطمه زهرا با سربلندی و افتخار از این آزمایش بزرگ الهی خارج شدند و برای بقاء اسلام، در مقابل این همه ظلم و ستم از حقوق مسلم خود چشم بستند و دم نزدند. حتی وقتی امیرالمؤمنین علیه السلام به خلافت دست یافت، باز هم به فدک که سرمایه هنگفتی بود،اعتنایی نکرد و فدک در طول تاریخ به تاراج رفت . &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;به هر حال فاطمه علیهاسلام هر روز رنجورتر می‏شد و کم کم حالش رو به وخامت می‏رفت. همه مسلمین از این پیش آمدها ناراحت بودند. زنان مدینه به عیادت آن حضرت آمدند و حضرت خطبه‏ای برای آنها ایراد فرمود که چرا شوهران‌شان امیرالمؤمنین را یاری نکردند. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;A id=&quot;در آستانه شهادت&quot;&gt;
&lt;H1&gt;&lt;FONT size=3&gt;در آستانه شهادت&lt;/FONT&gt; &lt;/H1&gt;&lt;/A&gt;فاطمه علیهاسلام روزهای آخر عمر خود را سپری می‏کرد و به شدت از ابوبکر و عمر ناراضی بود، اما آنها که نارضایتی فاطمه را به صلاح حکومت خود نمی‌دیدند، آمدند تا به عنوان عیادت، رضایت وی را جلب کنند. فاطمه زهرا ابتدا نپذیرفت اما آنها پس از چند بار، امیرالمؤمنین علیهالسلام را واسطه کردند و بالاخره با اصرار زیاد به عیادت او آمدند . در همین ملاقات بود که فاطمه علیهاسلام رسماً نارضایتی خود را به گوش آنها رساند. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;کم کم فاطمه علیها سلام آستانه شهادت قرار گرفت. دستور داد برایش تابوت ساختند و سپس به امیرالمؤمنین وصیت نمود. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;A id=&quot;شهادت و دفن&quot;&gt;
&lt;H1&gt;&lt;FONT size=3&gt;شهادت و دفن&lt;/FONT&gt; &lt;/H1&gt;&lt;/A&gt;روح پاکش در عصر یک روز غم‏انگیز از خانه دلتنگ دنیا پر کشید و به درجه رفیع شهادت نایل شد. &lt;BR&gt;خبر شهادت آن حضرت فوراً در بین مردم انتشار یافت و مدینه یک‌پارچه عزا و گریه شد . سیل جمعیت برای دلداری و تسلیت امیرالمؤمنین و فرزندان خردسال فاطمه به طرف آن خانه کوچک سرازیر بود تا کم‌کم خورشید غروب کرد. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;مردم متفرق شدند و علی تنها شد. شب بود؛ او شخصاً برای تغسیل و تدفین اقدام فرمود. شبانه آن بدن آزرده را همراه باران اشک خود غسل داد و کفن نمود و با عده کمی از شیعیان خاص خود بر او نماز خواند و بدن بی‌جان فاطمه را در گوشه‏ای دور از چشم بیگانگان به‌خاک سپرد ؛ سپس با دستی خالی و سینه‏ای پردرد به سوی قبر مطهر رسول خدا رو کرد و با کلماتی دلسوز خاطر خود را تسلی داد. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;صبح شد و مسلمان‌ها که از تدفین فاطمه علیهاسلام خبر نداشتند جمع شدند. وقتی که از دفن زهرا مطلع شدند با کمال جسارت خواستار نبش قبرش شدند که ناگهان با غرش شیر خدا، نفس‌ها در سینه‏ها حبس شد و از تصمیم خود منصرف شدند. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;A id=&quot;مخفی ماندن قبر مطهرش&quot;&gt;
&lt;H1&gt;&lt;FONT size=3&gt;مخفی ماندن قبر مطهرش&lt;/FONT&gt; &lt;/H1&gt;&lt;/A&gt;قبر مطهر فاطمه علیهاسلام باید تا قیامت، تا قیام فرزند عزیزش حجه بن الحسن عجل الله تعالی فرجه مخفی بماند تا سندی زنده بر مظلومیت آن بانو و گواهی بر ظلم و ستم قاتلین او باشد. اما راویان نکته‌سنج و عاشقان هوشمند که بوی تربت فاطمه را می شناسند از لابه‏لای کلمات ائمه اطهار و صفحات تاریخ به جستجوی قبر مطهر آن بانوی مظلومه برآمدند و به گمانی قریب به یقین، آن را در خانه خودش یافتند. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;از فاطمه زهرا علیهاسلام روایاتی به جهان اسلام تقدیم شده که یکی از بهترین میراث آن حضرت در خطوط تاریخ است ولی افسوس که دفتر روز شمار تاریخ زندگانی‌اش برای ابد بسته شده و دیگر سخنی بر آنها اضافه نشده است. &lt;BR&gt;</description>
<pubDate>Sun, 16 Jul 2006 06:45:18 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=114nor&amp;postid=28</comments>
<dc:creator>114nor</dc:creator>
<guid>http://114nor.blogfa.com/post-28.aspx</guid>
</item>
<item>
<title>حزب الله</title>
<link>http://114nor.blogfa.com/post-27.aspx</link>
<description>&lt;MARQUEE style=&quot;WIDTH: 245px; HEIGHT: 200px&quot; direction=down&gt;&lt;IMG style=&quot;WIDTH: 249px; HEIGHT: 229px&quot; height=188 src=&quot;http://www.jamejamonline.ir/images/20040422/gaza2.jpg&quot; width=300 hight=&quot;350&quot;&gt;&lt;/MARQUEE&gt;&lt;IMG style=&quot;WIDTH: 280px; HEIGHT: 199px&quot; height=30 alt=&quot;&quot; hspace=0 src=&quot;http://www.tebyan.net/Adabi-Honari/83/02/Image/ad_08_hizbollah01.jpg&quot; width=300 align=baseline border=0&gt; </description>
<pubDate>Fri, 07 Jul 2006 10:22:18 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=114nor&amp;postid=27</comments>
<dc:creator>114nor</dc:creator>
<guid>http://114nor.blogfa.com/post-27.aspx</guid>
</item>
<item>
<title>قرآن کریم</title>
<link>http://114nor.blogfa.com/post-26.aspx</link>
<description></description>
<pubDate>Thu, 06 Jul 2006 16:31:18 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=114nor&amp;postid=26</comments>
<dc:creator>114nor</dc:creator>
<guid>http://114nor.blogfa.com/post-26.aspx</guid>
</item>
<item>
<title> پيام رهبر به مناسبت  سال 1385 </title>
<link>http://114nor.blogfa.com/post-25.aspx</link>
<description>&lt;P style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%&quot; align=center&gt;&lt;STRONG&gt;فرازِي از پيام نوروزي رهبر معظم انقلاب به مناسبت حلول سال 1385&lt;/STRONG&gt; 
&lt;P style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%&quot; align=justify&gt;در اين مقطع زمانى، ياد و نام مبارك پيامبر اعظم از هميشه زنده‏تر است؛ و اين يكى از تدابير حكمت و الطاف خفيّه‏ى الهى است. امروز امت اسلام و ملت ما بيش از هميشه به پيغمبر اعظم خود نيازمند است؛ به هدايت او، به بشارت و انذار او، به پيام و معنويت او، و به رحمتى كه او به انسان‏ها درس داد و تعليم داد. امروز درس پيغمبر اسلام براى امتش و براى همه‏ى بشريت، درسِ عالم شدن، قوى شدن، درس اخلاق و كرامت، درس رحمت، درس جهاد و عزت، و درس مقاومت است. پس &lt;B&gt;نام امسال به طور طبيعى، نام مبارك پيامبر اعظم است&lt;/B&gt;. در سايه‏ى اين نام و اين ياد، ملت ما درس‏هاى پيغمبر را بايد مرور كند و آنها را به درس‏هاى زندگى و برنامه‏هاى جارى خود تبديل كند. ملت ما به شاگردى مكتب نبوى و درس محمّدى (صلّى‏اللَّه‏عليه‏وآله) افتخار مى‏كند. ملت ما پرچم اسلام را در ميان امت اسلامى با استقامت و استحكام برافراشته است؛ سختى‏ها را تحمل كرده است و كاميابى‏هاى حضور در اين ميدان شرف و افتخار را ديده است و به فضل الهى، كاميابى‏هاى بيشتر در راه است.&lt;SPAN lang=en-us&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%&quot; align=justify&gt;ما درس اخلاق پيغمبر، درس عزت پيامبر اعظم، درس علم‏آموزى و درس رحمت و كرامت و درس وحدتى را كه ايشان به ما داد و درس‏هاى زندگى ماست، بايد در برنامه‏ى زندگى خودمان قرار بدهيم.&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Mon, 19 Jun 2006 06:15:18 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=114nor&amp;postid=25</comments>
<dc:creator>114nor</dc:creator>
<guid>http://114nor.blogfa.com/post-25.aspx</guid>
</item>
<item>
<title>گالري عكس</title>
<link>http://114nor.blogfa.com/post-24.aspx</link>
<description>&lt;!-- Start WebGozar.com Rss Reader code  --&gt;
&lt;STYLE&gt;
.WFeedTitle{font-family:tahoma;font-size:8pt;color:#003399;text-decoration:none;font-weight:600}.WFeedTitle:hover{color:#ff4400;}
.WFeed{font-family:tahoma;font-size:9pt;color:#003399;text-decoration:none;}.WFeed:hover{color:#ff4400;}
&lt;/STYLE&gt;

&lt;SCRIPT language=javascript src=&quot;http://reader.webgozar.com/feedreader/reader.aspx?Feed=http://mehrnews.com/rss/rss.aspx?service=Picture&amp;amp;maxFeed=10&quot;&gt;&lt;/SCRIPT&gt;
&lt;!-- End WebGozar.com Rss Reader code --&gt;</description>
<pubDate>Mon, 19 Jun 2006 06:09:18 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=114nor&amp;postid=24</comments>
<dc:creator>114nor</dc:creator>
<guid>http://114nor.blogfa.com/post-24.aspx</guid>
</item>
<item>
<title>مقاله</title>
<link>http://114nor.blogfa.com/post-23.aspx</link>
<description>&lt;H1 dir=rtl style=&quot;TEXT-ALIGN: center&quot; align=center&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;بسم الله الرحمن الرحيم&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/H1&gt;
&lt;H1 dir=rtl style=&quot;TEXT-ALIGN: center&quot; align=center&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&lt;FONT color=#000080 size=4&gt;داستانهاي قرآني &lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/H1&gt;
&lt;H1 dir=rtl style=&quot;TEXT-ALIGN: right&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;مقدمه (1)&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/H1&gt;
&lt;P class=MsoBodyTextIndent dir=rtl&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;قرآن كريم آخرين وحي نامةالهي در اديان توحيدي و ابراهيمي و كتاب مقدس اسلام است كه به عين الفاظ و حياتي است و بدون هيچ كم و كاستي، با دقيق‌ترين جمع و تدويني كه در تاريخ كتب آسماني سابقهدارد .با استفادهاز نسخه‌اي كه در زمان حيات پيامبر(ص) نوشته شده بود ولي حالت كتابي و مصحف نداشته، در عصر عثمان به هيئت كتاب در مي‌آيد و اين واقعة عظيمدوران ساز در فاصلة بين 11 هجري وفات پيامبر(ص9 و 3) هجري كه هنوز 5 سال از خلافت عثماني باقي بوده است ، انجام مي گيرد . &lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-INDENT: 22.7pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;بنابراين قرآن كهنترين و معبرترين پشتوانه و گنجينة زبان عربي است . قطع نظر از جنبه قدسي و حياتي‌اش اهميت زباني و ادبي و لغوي بلاغي آن نيز طراز اول است . لذا دستور اهميت قرآن كريم فقط در اين نيست كه وحي نامه‌اي به عين الفاظ و بدون تغيير و تحريف است و اساس شريعت و علوم شرعي اسلامي را تشكيل مي دهد،‌بلكه در اين هم هست كه فرهنگ آخرين است . &lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;مقدمه (2) &lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-INDENT: 22.7pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;در قرآن كريم در لابه‌لاي مباحث و مسائل توحيدي و مربوط به خلقت جهان و انسان و دربارة آخريت و توصيف بهشت و جهنم و احكام فقهي و مضامين و معاني متعدد ديگر شرح حال اقوام و انبياي پيشين هم آمده است و جز داستان حضرت يوسف هيچ داستاني از آغاز تا انجام در يك توصيف و ترتيب و توالي كامل نيامده است، بلكه غالباً تلميحات و اشارات كم و كوتاه به هر قصه‌اي هست. &lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-INDENT: 22.7pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;لذاقصرها‌ گاه مكرر است (البته در عين وحدت معنا گاه تنوع تعبير و عبارت دارد) و گاه مكمل همديگر . &lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-INDENT: 22.7pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;قصه‌هاي قرآن اعم از قصه‌هاي پيامبران است يعني سخن از شخصيتهاي غير پيامبر اعم از مثبت مانند لقمان و مؤمن آل فرعون يا منفي مانند سامري و قارون و فرعون آمده است . نيز بايد توجه داشت كه در مورد داستانهاي قرآن همواره بايد از قصه يا قصص استفاده كنيم و كاربرد كلمة اسطوره يا اساطير روا و صحيح نيست. &lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;H1 dir=rtl style=&quot;TEXT-ALIGN: right&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;قصص قرآن &lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/H1&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-INDENT: 22.7pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;قرآن كتابي است با تنوع عظيم موضوعي و پرمضمون و معنايي، كه از اين نظر و با توجه به حجمش هيچ كتابي آسماني ديگر يا بشري كه در عين حال ارزش والاي هنري هم داشته باشد قابل مقايسه نيست . در نسج شگرف و گوناگون و مضمون در مضمون، قرآن كريم كه خطي نيست بلكه حلقوي و حجمي است يك آهنگ خوشنواي سراسري، گاه پيدا و گاه پيوسته و گاه گسسته تكرار مي شود وآن قصص قرآن است. &lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-INDENT: 22.7pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;نيز پيشتر اشاره شد كه قصص قرآن اعم از قصص انبياء است به اين شرح كه هر قصة پيامبري مانند قصة نوح، هود يا ابراهيم عليهم السلام جز و قصص قرآن است ولي هر قصة قرآني از جمله قصة قارون يا لقمان يا زيد جز و قصص انبياء و اقوام پيشين نشان مي داده‌اند. &lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-INDENT: 22.7pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;دو پديده در همين زمينه، در همان صدر اسلام رخ نموده است. يكي از آنها كوشش يكي از مشركان مكه به نام نفنربن حارث بود كه مردي جهانديده و اگر طنز آميز نباشد ايران شناس بود. يعني هم به ايران سفر كرده بود و هم به احتمال نزديك به واقع فارسي مي دانست و در شناخت قصص و اساطير ايراني دست داشت و مي‌كوشيد كه در برابر جاذبة عظيم و بهخيال خود سحرگونة قرآن كريم، مقاومت كند و در جهت نفي حكمت از آن برآيد. و براي انصراف خاطر و توجه كساني كه مجذوب قرآن مي شدند، داستهاي رستم و اسفنديار و نيز داستانهاي ديگري از ايران باستان را كه بعدها در شاهنامه مدون شد ، براي آنان مي خواندند كه به تعبير قرآن كريم لهوالحديث ( يعني داستانهاي سرگرم كننده و بي‌پايه و آكنده از اساطير و خرافات ) بود. &lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-INDENT: 22.7pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;پديدة حارث نشان مي دهد كه داستانهاي قرآن در دل مخاطبان نفوذ داشته است . پديدة ديگر ، نقل و حكايات اهل كتاب مخصوصاً يهوديان اسلام آوردة معاصر پيامبر(ص) علي الخصوص كعب الاجار، وقب بن منبه و عبدالله بن سلام بود كه براي شرح و بسط دادن به قصص قرآن از مأثورات يا مسموعات خود، به عنوان تفسير استفادهمي كردند كه به اسرائيليات (يعني وابسته به معارف بني اسرائيل و توسعاً يعني يهود) معروف است. &lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-INDENT: 22.7pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;بعضي از محققّان و قرآن پژوهان به اسرائيليات و قرينة آن نصرانيات (نقل مأثورات ومعارف مسيحي براي شرح و بسط دادن مسائل اسلامي ) توجه ـ كامل دارند و براي آنها ارزش حقيقي ـ تاريخي قائلند. و بعضي ديگر برعكس. دربارة آنها به كلي بدگمانند يا برآنند كه اينگونه اخبار افسانه‌آميز را كه غير تاريخي و غير انتقادي است و تفاسير مسلمانان را آلوده كرده است را از بين ببرند. به نظر مي رسد كه بايد با اسرائيليان و نصرانيان، با احتياط و انتقاد علمي بدون احساسات حاد اعم از مثبت و موافق يا منفي و مخالف مواجه شد.&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-INDENT: 22.7pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;چرا كه رد يا قبول افراطي آنها زيانبار است اما تلقي انتقادي مي تواند مفيدباشد. &lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;H1 dir=rtl style=&quot;TEXT-ALIGN: right&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;تفاوتها و شباهتها &lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/H1&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-INDENT: 22.7pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;قصه‌هاي قرآني با قصه‌هاي عادي و عرض انساني هم شباهتهاي بسيار و هم تفاوتهاي بسياري دارد . في المثل قصه‌هاي قرآني همه حق و صدق و راست و درست است. هيچ كدام حاصل تخيل و برساخته نيست اما با داستانهاي واقعي و واقع گرايانة بشري هم فرصتهاي عمده دارد . في المثل در قصص قرآن هيچ شخصيت كه وجود خارجي نداشتده باشد خلق نمي شود. يا بر داستانهاي قرآني جز آنكه تخيل راه ندارد، اغراق و اطناب و به اصطلاح آب و تاب و زمينه سازي زماني و مكاني و طرح و توطئه‌هاي ادبي و نظاير آن نيز راه ندارد. &lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-INDENT: 22.7pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;حتي داستانهاي قرآني توالي و تسلسل ظاهري هم ندارند و غالباً تلميحات به گوشه‌اي از زندگي و سوانح عمري انبياي الهي در چند آيه به عمل مي آيد و اينگونه تلميحات و اشارات در سراسرقرآن كريم گسترده و به ندرت يك داستان از آغاز تا انجام در يك سوره مي آيد . تنها يكي استثناء معروف داريم كه عبارتاست از داستان حضرت يوسف (ع) و برادرانش كه به صورت يكپارچه سراسر سورة يوسف را در برگرفته است . &lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-INDENT: 22.7pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;بعد از آن تا حدودي به اين موارد مي‌توان اشاره كرد كه البته به اندازة داستان يوسف يكپارچه مسلسل و مفصل نيستند. &lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-INDENT: 22.7pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;داستان حضرت موسي در سورة طه: داستان داود در سورة (ص) ، داستان سليمان در سوره نمل، داستان نوح در سورة نوح … &lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-INDENT: 22.7pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;ولي جاي شگفتي است كه داستان يونس در سورة يونس حتي به اندازة چند آيه هم نيست و داستان ابراهيم فقط در سورة ابراهيم نيست و در سوره ابراهيم فقط داستان ابراهيم نيست بلكه مضامين و قصص ديگري هم هست . وبقيه و بلكه عمدة داستان او را بايد در سورة بقره و سوره‌هاي ديگر يافت . اشاره بر حضرت ابراهيم (ع) در 15 سورة قرآن پراكنده است. &lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-INDENT: 22.7pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;يكي ديگر از تفاوتهاي داستانهاي قرآني وداستانهاي بشري در اهداف آنهاست كه هدف قرآن سرگرمي يا ايجاد خط هنري به تنهايي نيست بلكه انذار يعني هشدار دادن و اعتبار يعني عبرت گرفتن و بيان اصول و احكام و نتايج اخلاقي است. &lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-INDENT: 22.7pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;همچنين تسلي دادن به حضرت رسول(ص) تا بداند كه انبياي عظام الهي در راه دعوت و ارشاد مردم چه رنجها كشيده‌اند و چه بي مهريها ديده‌اند و همچنان نستوه و شكست ناپذير و بدون نرمش و سازش در برابر باطل، همواره حقجو و حقگو بوده‌اند و نظاير اين نيز مي توان گفت. &lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-INDENT: 22.7pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;سرگذشت اقوام و امم پيشين نيز به نوعي سنن الهي و فلسفة تاريخ الهي را باز مي‌نماياند. ونشان مي‌دهد كه اتراف يا استكبار بطر و بي ايماني و فساد اخلاقي چه بسيار اقوام را به نابودي كشانده و نظاير اين درس و عبرتها و حكمتها .&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;H1 dir=rtl style=&quot;TEXT-ALIGN: right&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;معرفي كتاب &lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/H1&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-INDENT: 22.7pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;از خود قصص قرآن يا قصص انبياء و نيز دربارة آنها كتابها پرداخته‌اند به فارسي آثار كهن دل‌انگيزي داريم. مانند قصص الانبياء نيشابوري، قصه‌هاي قرآن برگرفته از تفسير سورآبادي. داستانهاي قرآني مشروح و مفصلي كه در تفسير كشف الاسرار و تفسير ابوالفتح رازي آمده است. (داستانهاي تفسير اخير را آقاي عسگر حقوقي گردآورده است). در عصر جديد نيز قصص قرآن آقاي صدرالدين بلاغي و تاريخ انبياء كه تأليف و ترجمة سيد محمد باقر موسوي و علي اكبر غفاري و نيز در سال گذشته اثر ارزشمندي به نام داستانهاي پيامبران با سبك امروزين و در عين حال اتكاء تمام به نقل و روايت قرآني به قلم آقاي سيدعلي موسوي گرمارودي انتشار يافته و با استقبال جوانان و قرآن پژوهان و اهل ادب مواجه شده است و كراراً به چاپ رسيده است.&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;H1 dir=rtl style=&quot;TEXT-ALIGN: right&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;احسن القصص &lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/H1&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-INDENT: 22.7pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;با اينكه قرآن داستانهاي جالب و جذاب زيادي هر دو سورة يوسف به عنوان بهترين داستان قرآن معرفي مي شود. به عبارتي نام ديگر اين سوره احسن القصص يعني بهترين داستان ياد مي شود. &lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;H1 dir=rtl style=&quot;TEXT-ALIGN: right&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;سورة قصص &lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/H1&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-INDENT: 22.7pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;در قرآن سوره‌اي به نام سورة قصص وجود دارد كه به معني داستانهاست. كه موضوع اين سوره راجع به پاداش مؤمن ـ وعدة پيشوائي مؤمنين بر مردم مي باشد . &lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-INDENT: 22.7pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;وجه تسمية اين سوره به قصص پرداختن به داستان سرايي يا قصص (بافتح قاف) مربوط به بعضي انبياء است. كه مفصلتر از همه داستان موسي(ع) از آية 3 تا 46 است . نام ديگر سورة قصص سورة موسي و فرعون ست . 88 آيه و 1439 كلمه هرد. به ترتيب مصحف 28 سوره و به ترتيب نزول 49 سورة قرآن و مكي است . صحيح آن كمي بيش از نيم جزء است . داستان قارون نيز در همين سوره است . &lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; TEXT-INDENT: 22.7pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;منبع:&lt;A href=&quot;http://www.iska.ir/&quot; target=_blank&gt;ایسکا&lt;/A&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Mon, 19 Jun 2006 05:58:12 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=114nor&amp;postid=23</comments>
<dc:creator>114nor</dc:creator>
<guid>http://114nor.blogfa.com/post-23.aspx</guid>
</item>
<item>
<title>داستان های قـرآنی</title>
<link>http://114nor.blogfa.com/post-22.aspx</link>
<description>&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: center&quot; align=center&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 22pt; COLOR: red; LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: &apos;B Arabic Style&apos;&quot;&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; MARGIN: 0cm 0cm 0pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot; align=center&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: &apos;B Nazanin&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT size=4&gt;قوم هود&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; MARGIN: 0cm 0cm 0pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: &apos;B Nazanin&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;&amp;nbsp;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; MARGIN: 0cm 0cm 0pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: &apos;B Nazanin&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;در سرزمين يمن قومي مي زيستند كه بت پرست بوده و كفران نعمات الهي را امري عادي بر مي شمردند. اين قوم مردماني نيرومند داشت كه از قواي جسماني زيادي برخوردار بودند. در ميان ايشان پيامبري زندگي مي كرد كه &quot;هود&quot; نام داشت. هود(ع) به منظور هدايت &lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/SPAN&gt;ايشان مي گفت:&lt;?xml:namespace prefix = o ns = &quot;urn:schemas-microsoft-com:office:office&quot; /&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; MARGIN: 0cm 0cm 0pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; COLOR: red; LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: &apos;B Nazanin&apos;; mso-ascii-font-family: Tahoma; mso-hansi-font-family: Tahoma&quot;&gt;قال يا قوم اعبدوا اللّه ما لكم من اله غيره افلا تتقون .&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; LINE-HEIGHT: 150%; mso-bidi-font-family: &apos;B Nazanin&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; MARGIN: 0cm 0cm 0pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; COLOR: blue; LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: &apos;B Nazanin&apos;; mso-ascii-font-family: Tahoma; mso-hansi-font-family: Tahoma&quot;&gt;اى قوم من ! خداوند يگانه را بپرستيد كه هيچ معبودى براى شما غير او نيست , آيا پرهيزگارى را پيشه نمى كنيد. &lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; COLOR: blue; LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: &apos;B Nazanin&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; MARGIN: 0cm 0cm 0pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: &apos;B Nazanin&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;اما گنهكاران قوم هود با گستاخي تمام او را به دروغ گوئي متهم مي نمودند و به حضرت هود مي گفتند:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; MARGIN: 0cm 0cm 0pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; COLOR: red; LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: &apos;B Nazanin&apos;; mso-ascii-font-family: Tahoma; mso-hansi-font-family: Tahoma&quot;&gt;قال الملا الذين كفروا من قومه انا لنريك فى سفاهة وانا لنظنك من الكاذبين &lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; LINE-HEIGHT: 150%; mso-bidi-font-family: &apos;B Nazanin&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; MARGIN: 0cm 0cm 0pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; COLOR: blue; LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: &apos;B Nazanin&apos;; mso-ascii-font-family: Tahoma; mso-hansi-font-family: Tahoma&quot;&gt;اشراف كافر قوم او گـفـتـند ما تو را در سفاهت و سبك مغزى مى بينيم و گمان مى كنيم تو از دروغگويان باشى. &lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; COLOR: blue; LINE-HEIGHT: 150%; mso-bidi-font-family: &apos;B Nazanin&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; MARGIN: 0cm 0cm 0pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: &apos;B Nazanin&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;هود(ع) نيز به دفاع از خود مي پرداخت و ضمن دعوت ايشان به ايمان مي فرمود:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; MARGIN: 0cm 0cm 0pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; COLOR: red; LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: &apos;B Nazanin&apos;; mso-ascii-font-family: Tahoma; mso-hansi-font-family: Tahoma&quot;&gt;ابلغكم رسالا ت ربى وانا لكم ناصح امين &lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; LINE-HEIGHT: 150%; mso-bidi-font-family: &apos;B Nazanin&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; MARGIN: 0cm 0cm 0pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; COLOR: blue; LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: &apos;B Nazanin&apos;; mso-ascii-font-family: Tahoma; mso-hansi-font-family: Tahoma&quot;&gt;رسالتهاى پروردگارم را به شما ابلاغ مى كنم ; و من خيرخواه امينى براى شما هستم &lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; COLOR: blue; LINE-HEIGHT: 150%; mso-bidi-font-family: &apos;B Nazanin&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; MARGIN: 0cm 0cm 0pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: &apos;B Nazanin&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;همچنين هود(ع) براي يادآوري نعمات الهي جانشيني ايشان را از نسل نوح بيان مي فرمود و همچون ديگر پيامبران به هر طريق ممكن سعي در هدايت قوم خويش داشت. اما متاسفانه قوم لجوج هود ضمن مخالفت با او به پرستش آنچه از نياكانشان مرسوم بود اصرار مي ورزيدند، و نهايتا به هود(ع) گفتند:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; MARGIN: 0cm 0cm 0pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; COLOR: red; LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: &apos;B Nazanin&apos;; mso-ascii-font-family: Tahoma; mso-hansi-font-family: Tahoma&quot;&gt;فاتنا بما تعدنا ان كنت من الصادقين &lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; LINE-HEIGHT: 150%; mso-bidi-font-family: &apos;B Nazanin&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; MARGIN: 0cm 0cm 0pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; COLOR: blue; LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: &apos;B Nazanin&apos;; mso-ascii-font-family: Tahoma; mso-hansi-font-family: Tahoma&quot;&gt;اگر راست مى گويى (و عذابها و مجازاتهايى راكه به ما وعده مى دهى حقيقت دارد) هـر چـه زودتر آنها را به سراغ ما بفرست و ما رامحو و نابودن كن &lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; COLOR: blue; LINE-HEIGHT: 150%; mso-bidi-font-family: &apos;B Nazanin&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; MARGIN: 0cm 0cm 0pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: &apos;B Nazanin&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;حضرت هود نيز پس از نوميدي از ايمان آوردن كافرين به ايشان گفت:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; MARGIN: 0cm 0cm 0pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; COLOR: red; LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: &apos;B Nazanin&apos;; mso-ascii-font-family: Tahoma; mso-hansi-font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;قال قد وقع عليكم من ربكم رجس وغضب&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; MARGIN: 0cm 0cm 0pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; COLOR: blue; LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: &apos;B Nazanin&apos;; mso-ascii-font-family: Tahoma; mso-hansi-font-family: Tahoma&quot;&gt;اكنون كه چنين است بدانيد عـذاب و كـيـفـر خـشم خدا بر شما مسلما واقع خواهد شد &lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; COLOR: blue; LINE-HEIGHT: 150%; mso-bidi-font-family: &apos;B Nazanin&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; MARGIN: 0cm 0cm 0pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: &apos;B Nazanin&apos;&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;و پس از تذكراتي مجدد افزود:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; MARGIN: 0cm 0cm 0pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; COLOR: red; LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: &apos;B Nazanin&apos;; mso-ascii-font-family: Tahoma; mso-hansi-font-family: Tahoma&quot;&gt;فـانـتـظـروا انـى مـعكم من المنتظرين&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; LINE-HEIGHT: 150%; mso-bidi-font-family: &apos;B Nazanin&apos;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; MARGIN: 0cm 0cm 0pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; COLOR: blue; LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: &apos;B Nazanin&apos;; mso-ascii-font-family: Tahoma; mso-hansi-font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;اكـنون كه چنين است شما در انتظار بمانيد من هم با شما انتظارمى كشم&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; MARGIN: 0cm 0cm 0pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; COLOR: black; LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: &apos;B Nazanin&apos;; mso-ascii-font-family: Tahoma; mso-hansi-font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;خداوند نيز پس از اتمام حجت هود(ع) به آنچه كه مردمان گمراه قوم هود خواسته بودند جامه عمل پوشانيد و بر آنان عذابي سخت نازل فرمود.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; MARGIN: 0cm 0cm 0pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; COLOR: red; LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: &apos;B Nazanin&apos;; mso-ascii-font-family: Tahoma; mso-hansi-font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;فانجيناه والذين معه برحمة منا وقطعنا دابرالذين كذبوا بياتنا وما كانوا مؤمنين &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;TEXT-JUSTIFY: kashida; MARGIN: 0cm 0cm 0pt; LINE-HEIGHT: 150%; TEXT-ALIGN: justify; TEXT-KASHIDA: 0%&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; COLOR: blue; LINE-HEIGHT: 150%; FONT-FAMILY: &apos;B Nazanin&apos;; mso-ascii-font-family: Tahoma; mso-hansi-font-family: Tahoma&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;ما هود و كـسـانـى را كـه با او بودند به لطف و رحمت خود, رهايى بخشيديم , و ريشه كسانى كه آيات ما را تـكذيب كردند و حاضر نبودند در برابر حق تسليم شوند, قطع و نابود ساختيم .&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Mon, 19 Jun 2006 05:55:20 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=114nor&amp;postid=22</comments>
<dc:creator>114nor</dc:creator>
<guid>http://114nor.blogfa.com/post-22.aspx</guid>
</item>
<item>
<title>سخنان گهربار</title>
<link>http://114nor.blogfa.com/post-21.aspx</link>
<description>&lt;TABLE dir=rtl width=&quot;100%&quot; border=0&gt;
&lt;TBODY&gt;
&lt;TR vAlign=top&gt;
&lt;TD class=Text-Body vAlign=top align=right width=70&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=en-us&gt; &lt;/SPAN&gt;عنوان:&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD class=title_size vAlign=top&gt;خوردن‌ قسم‌&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;
&lt;TR vAlign=top&gt;
&lt;TD vAlign=top width=70&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD class=title_size vAlign=top&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;&lt;/TBODY&gt;&lt;/TABLE&gt;
&lt;TABLE dir=rtl width=&quot;95%&quot; align=center border=0&gt;
&lt;TBODY&gt;
&lt;TR&gt;
&lt;TD&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT color=#0000ff&gt;&lt;SPAN lang=en-us&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;ترجمه: &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;
&lt;TR vAlign=top&gt;
&lt;TD style=&quot;LINE-HEIGHT: 1.9&quot; vAlign=top align=right&gt;
&lt;P style=&quot;FONT-SIZE: 13px; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;BR&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; هر كس‌ از شما در خوردن‌ قسم‌ جدى‌تر است‌ به‌ جهنم‌ نزديكتر است‌ . &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;&lt;FONT color=blue&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;&lt;/TBODY&gt;&lt;/TABLE&gt;
&lt;HR align=center width=&quot;95%&quot;&gt;
&lt;FONT color=#0000ff&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=en-us&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;متن حدیث: &lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;
&lt;TABLE dir=rtl width=&quot;95%&quot; align=center border=0&gt;
&lt;TBODY&gt;
&lt;TR&gt;
&lt;TD vAlign=top&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;
&lt;TR vAlign=top&gt;
&lt;TD style=&quot;LINE-HEIGHT: 1.5&quot; vAlign=top align=right&gt;&lt;FONT face=tahoma size=2&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;&lt;/TBODY&gt;&lt;/TABLE&gt;
&lt;TABLE dir=rtl width=&quot;95%&quot; border=0&gt;
&lt;TBODY&gt;
&lt;TR&gt;
&lt;TD vAlign=top align=right height=20&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;
&lt;TR&gt;
&lt;TD vAlign=top&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT color=#0000ff&gt;&lt;SPAN lang=en-us&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/SPAN&gt;منبع:&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt; &lt;FONT face=tahoma size=2&gt;&amp;nbsp; ( كنز العمال‌ ، ج‌ 11 ، ص‌ 7 ، ح‌ 30390) &lt;/FONT&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;
&lt;TR vAlign=top&gt;
&lt;TD style=&quot;LINE-HEIGHT: 1&quot; vAlign=top align=right&gt;&lt;FONT face=tahoma size=2&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;&lt;/TBODY&gt;&lt;/TABLE&gt;</description>
<pubDate>Tue, 30 May 2006 07:43:16 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=114nor&amp;postid=21</comments>
<dc:creator>114nor</dc:creator>
<guid>http://114nor.blogfa.com/post-21.aspx</guid>
</item>
</channel>
</rss>
